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एक बार जो मरता हैं वो एक बार ही मरता हैं बार बार जो खुद को मारे उसे कोन क्या करता हैं बैठं अकेले पण मे खुद को कोस के रोज दे एक ही डोज खुद को कहेकर बुरा भला मन मे मे करले वो कुछ खोज क्या पता क्या मस्ती हैं जब कोई उसे कुछ नहीं कहेता चष्मा पहेने खुद कमिना ऊसी नजरिये वो बहेता हो कोई कित्ना अच्छा पर पर रोज रोज गर ये देखे निगेटिव्ह निगेटिव्ह कहेके साले ग्रुप से बाहर वो फेके उदास बंदे होते जो वो मन से भरे ही होते हैं कही भी आशा नही दिखती तब अकेले पण मे रोते हैं हसता चहेरा कम दिखे कभी बिना बात के हस जाए ऐसा तेढा भाव हैं इनका कोई कुछ ना कर पाये गलती किसिकी हो भी पर खुद को दोषी पाते हैं खुद को सूनाये रोज नया अंधेर के भितर जाते हैं अब बताता हुं इस पर क्या एक मर्ज हैं दिखा मुझे दोस्त बनाले ऐसे की ना उनको हो तुझ पर संशय खुद को भी मजबूत बना ना किसी के आगे कुछ तू उगल सुर्य भी हो गर तप्ता अंदर फिर भी उस्को जा तू निगल सर्दी खासी हो भी किसिको उसे ठीक तो होना हैं मन का मारिज जो बैठा हैं उसका विनाश ही होना हैं #सत्यसाधक

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5 years ago

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