ख़रीदी ज़िंदगी उधार में
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☺️उड़ गयी हवा में ख़ुशी मुड़ गयी फिर ज़िंदगी थी जिससे सच्ची दोस्ती दग़ा दे गयी राह में वही दिल तो कहता रहा यही नहीं ये सच है ही नहीं रहा होगा वो बदनसीब हक़ीक़त जो मानता नहीं क़समों वादों के बाज़ार में खरीदी ज़िंदगी उधार में चुका पाया कौन ये क़र्ज़ निभा पाया कोई ये फ़र्ज़☺️ 💕प्रकाश पाखरे💕
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