उनसे बचा कौन भला
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अंदाज़-ए-आशिक़ी है जुदा उनसे बच पाया कौन भला बिछा के दामन करते हैं खैर-ए-मख़दम नज़र में जिनकी हर शख़्स है ख़ुदा मासूम तो इतने हैं कि हर मयार है कम उनसे मिल पाना लगे मंज़िलों का फ़ासला कभी झलक भी मिले चमकतीं बिजलियां मिसाल बनी है जहां में उनकी हर अदा
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