तुमसे आस रखते हैं
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तुमसे अभी भी आस रखते हैं तुम हमें हम तुम्हें पास रखते हैं सोचकर यही तसल्ली कर लेते हैं शायद हमीं तुम्हें ख़ास लगते हैं तन्हा रहना भी अज़ाब लगता है इसी सोच में ज़रा निराश रहते हैं दूरियां जब जब बढ़ जाती हैं यक़ीं करो हम बदहवास रहते हैं यक़ीं अबतो तभी आयेगा सुनलो कहीं भी कभी आसपास दिखते हैं
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तुमसे अभी भी आस रखते हैं तुम हमें हम तुम्हें पास रखते हैं सोचकर यही तसल्ली कर लेते हैं शायद हमीं तुम्हें ख़ास लगते हैं तन्हा रहना भी अज़ाब लगता है इसी सोच में ज़रा निराश रहते हैं दूरियां जब जब बढ़ जाती हैं यक़ीं करो हम बदहवास रहते हैं यक़ीं अबतो तभी आयेगा सुनलो कहीं भी कभी आसपास दिखते हैं