होश में रहने की आदत थी,
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होश में रहने की आदत थी, अब नशे में चूर ही पड़े हैं। जिनसे मिली थी सारी खुशियां, वही अब दिल से दूर ही खड़े हैं। जाम उठाते हैं ग़म भुलाने को, पर हर घूंट में यादों से जुड़े हैं। दिल की हर धड़कन उनसे पूछे, क्यों वो अपने वादे से मुकर गए हैं। चाहत थी जिनकी हर घड़ी, आज वही दर्द बनकर जकड़े हुए हैं। सपनों का शहर उजड़ गया है, और हम बस खंडहर में सजे हुए हैं। सराब में डूब कर मैं खो गया,मे दिल के ग़मों को नशे में रो गया। मे प्यालों में जीने की उम्मीद थी, लेकिन हर घूंट में, बस तू ही है इसलिए सो गया।"मे अब तरस आता है खुद पे, कुछ करने की चाहत थी खो गई, जिन रास्तों पे चला था मैं, वो सारी उम्मीदें सो गई। ग़मों की लहरें उभरती हैं, दिल का शोर अब चुप हो गया, मुझे अब खुद से डर लगता है, वो प्यार भी कहीं खो गया।"
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